षिवजी को अपमान करने के लिए भू लोक मे। दक्षण ने एक यज्ञ किया प् अपने पिता को सुबद्वि देकर यज्ञ को रोकने के लिए पार्वती देवी ने षिवजी से अनुमति माँगा प् षिवजी ने पार्वती को इसलिए अनुमति न दिया क्यो।कि अपने जैसे पत्नी को भी अपमान न हो जाए प् लेकिन पार्वती देवी ने षिवजी की बात न मानी और भू लोक गयी प् पत्नी के द्वारा अवमर्यादा , एका।त, विरहवेदना , दझण के कारण अपनी पत्नी को होनेवाले अपमान , इसके फलस्वरुप का क्रोध , इत्यादि के कारण षिवजी ने भू लोक आने की इरादा मे। अपने बाई पैर को राजग।भीर पर्वत मे। रखा प् ( वही पर्वत, हमारा गा।व मे। है जहा। हमारा म।दिर भी) षिवजी की अग्नि के कारण पर्वत जलने जगा और भोज के कारण पर्वत, धरती मे। गिरने लगा प् इसलिए षिवजी अपने दूसरे पैर को पर्वत पर न रखकर धरती पर रखने की सोच मे। अपने दाई पैर को तिरुवण्णामलै के पास अडि अण्णामलै मे। रखा प् वह पद चिहृन अडि अण्णामलै के तालाब मे। है प् षिव का बाई पद चिहृन जहा। है , उसे मिदि पर्वत नाम से पुकारा जाता है प् आज भी पद चिहृन मिधि पर्वत मे। षाश्वत है प् सन्दवासल के आसपास के कलवासल गा।व के लोग इस मार्ग मे। पडवेडु जाते समय , उस पदचिहृन का आराधना करते है। प् उल्लेखनीय बात यह है कि षिव का दाई पैर जहा। रखा गया था उसे पूजनीय स्थल बनाये गये है। प् षिव की षिखर का ग।गा , अग्नि को बुझकर , प्रलय को रोकने के लिए अपने भाई महा विष्णु से प्रार्थना की प् उसकी प्रार्थना को मानकर महा विष्णु ने राजग।भीर पर्वत को धेरकर सात तालाब की सृश्टि किया और आग बुझाया प् आज भी इन पर्वतो। को धेरकर महा विश्णु के नाम से सात तालाब है। प् वे है। व्म्१ ‐ पेरुमाल सरोवर व्म्२ ‐ ऊटु पेरुमाल सरोवर व्म्३ ‐ काट्टु पेरुमाल सरोवर व्म्४ ‐ वाणिय पेरुमाल सरोवर व्म्५ ‐ कोमुट्टु पेरुमाल सरोवर व्म्६ ‐ कुट्टकरै सरोवर व्म्७ ‐ वेरुम सरोवर इस खुषी मे। ग।गा अपने भाई को धन्यवाद सहित प्रार्थना की प् बात यह है कि जहा। ग।गा प्रार्थना की , उसी जगह पर विश्णु म।दिर और ग।गै अम्मन म।दिर थे प् आने वशो। मे। विश्णु म।दिर का विनाष हुआ , ग।गै अम्मन म।दिर जीर्ण – षीर्ण हो गए प् तिरुवण्णामलै दीप जैसे नाट्टु कार्तिक के दिन ( विश्णु कार्तिक ) आज भी विश्णु दीप जलायी जाती है प् यह उल्लेखनीय बात है प्